
श्री क्षेत्र शुक्रताल (अनिलकुमार पालीवाल) –
श्रीमद् भागवत कथा मानव जीवन में आत्मशुद्धि के साथ तन, मन और अर्जित धन को भी शुद्ध करने का एक प्रभावशाली माध्यम है, ऐसा प्रतिपादन सुप्रसिद्ध कथा वाचक पंडित हरि नारायण वैष्णव ने कथा के दूसरे दिन किया। यहाँ श्री शिवधाम में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के अवसर पर उन्होंने अपनी रसपूर्ण वाणी से उपस्थित श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अपने कथा-निरूपण में आगे बोलते हुए वे कहे –
“मानव जीवन में धन को सर्वस्व माना जाता है, किंतु वास्तविक जीवन वही है जो माता-पिता और गुरु के ऋण की पूर्ति के लिए अपना सर्वस्व अर्पण करे। आज संयुक्त परिवार शेष नहीं रहे, यह खेद का विषय है। बहुओं को उन्होंने यह संदेश दिया कि धर्माचरण करते समय यदि वे सास-ससुर की सेवा करें तो उसका पुण्य कथा-श्रवण से प्राप्त पुण्य के समान ही होता है। इसलिए युवावस्था में सत्कर्म, दानधर्म और सेवा-त्याग को महत्व दिया तो जीवन अवश्य सफल होगा।”
कथा के दूसरे दिन उन्होंने गुरु, माता-पिता के जीवन में अडिग स्थान का महत्व समझाया। पुराणों में देवऋषि नारद द्वारा किए गए सत्कर्मों का उल्लेख कर कहा कि उनकी सच्ची सेवा का देवलोक में सदैव गौरव होता है। यदि हम भी निर्मल, निष्पक्ष और निर्भेळ जीवन जिएँ तो जीवन सफल होगा, ऐसा आशावाद उन्होंने प्रकट किया।
धन की शुद्धि पर बोलते हुए पंडित हरिनारायणजी ने कहा कि –
“यदि अर्जित धन सद्मार्ग से कमाया जाए और उसे अच्छे कार्यों में खर्च किया जाए तो निश्चित ही धनशुद्धि का आनंद लेकर सुखमय और निरामय जीवन जिया जा सकता है। किंतु कलियुग में वाममार्ग से कमाए बिना सफलता मिलती नहीं, यह दुखद स्थिति है।”
अपनी विनोदमय और अध्ययनपूर्ण कथा प्रस्तुति के साथ उन्होंने कई लयबद्ध भजन और गीत भी प्रस्तुत किए।
प्रारंभ में कथा के मुख्य यजमान झाडोत पालीवाल परिवार की ओर से आरती की गई। इस अवसर पर महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान सहित कई स्थानों से आए भक्त बड़ी संख्या में उपस्थित थे।
